देहरादून : उत्तराखंड की लोकभाषाओं गढ़वाली, कुमाऊँनी एवं जौनसारी को आर्टिफ़िशियल इंटेलिजेंस (AI) के माध्यम से संरक्षित और प्रोत्साहित करने की दिशा में आज एक महत्वपूर्ण प्रेस कॉन्फ़्रेंस आयोजित की गई। इस पहल का उद्देश्य आने वाली और वर्तमान पीढ़ियों को उनकी मातृभाषाओं से जोड़ना और उन्हें डिजिटल युग में जीवंत बनाना है।
इस अवसर पर एआई आर्किटेक्ट सचिदानंद सेमवाल ने कहा कि “यह कार्य हमारी बोली-भाषाओं के लिए एक मील का पत्थर साबित होगा। आने वाली पीढ़ियाँ अब गढ़वाली, कुमाऊनी और जौनसारी में AI टूल्स जैसे ChatGPT, Grok और Gemini पर बोलने, लिखने और सीखने में सक्षम होंगी।” उन्होंने इस परियोजना के महत्व और इसके लिए की जा रही तकनीकी तैयारियों पर विस्तृत जानकारी साझा की।
इस पहल के अंतर्गत भाषा और संस्कृति के विद्वानों के सहयोग से एक सुदृढ़ एवं प्रमाणिक डेटा सेट तैयार किया जाएगा, जिसका उपयोग AI मॉडल्स को प्रशिक्षित करने में किया जाएगा। इस दिशा में पद्मश्री प्रीतम भारतवाण, अपनी जागर एवं ढोल सागर अकादमी के माध्यम से भाषाई प्रमाणिकता एवं लोकसंस्कृति का योगदान सुनिश्चित करेंगे। वहीं, सचिदानंद सेमवाल, अपने 23 वर्षों के सॉफ्टवेयर, क्लाउड एवं AI अनुभव और विशेष रूप से पिछले 4 वर्षों के अमेरिका में जनरेटिव AI कार्यानुभव के आधार पर संपूर्ण तकनीकी, AI प्रशिक्षण एवं डेटा सेट निर्माण का नेतृत्व करेंगे।
यह परियोजना औपचारिक रूप से प्रारंभ हो चुकी है और इस संदर्भ में टीम को मुख्यमंत्री, भाषा मंत्री सुबोध उनियाल तथा भाषा सचिव से सकारात्मक सहमति एवं सहयोग का आश्वासन प्राप्त हुआ है। शीघ्र ही उत्तराखंड की यह मातृभाषाएँ AI आधारित चैट मॉडल्स पर उपलब्ध होंगी।

